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Monday, January 1, 2018

ग्रामीण व कमजोर छात्र IAS की तैयारी कैसे करे?

रमन एक सामान्‍य कृषक का पुत्र था। माता-पिता दोनों शिक्षित थे परन्‍तु उनकी शिक्षा हिन्‍दी माध्‍यम से हुई थी। पॉंचवी कक्षा में रमन को हिन्‍दी माध्‍यम  वाले सरकारी स्‍कूल में पढ़ाने के बाद उसके पिता उसका नाम अंग्रेजी स्‍कूल में लिखवा दिया। उन्‍होंने सोचा रमन अपनी कक्षा में हमेशा प्रथम आता है, इसलिए उसे अच्‍छे से अच्‍छे स्‍कूल में भेजना चाहिए। उनहें क्‍या पता था कि रमन जैसा मेधावी छात्र भी अंग्रेजी का समुद्र पार नहीं कर पाएगा।

रमन के लिए अंग्रेजी बहुत कठिन विषय बन गया था। घर में कोई अंग्रेजी नहीं जानता था और उसे पढ़ने के लिए समय भी कम मिलता था, क्‍योंकि वह घर के कामों में माता-पिता की भरपूर सहायता करने की कोशिश करता था। प्रथम सत्र की परीक्षा निकट आते ही उसने जी तोड़ मेहनत करनी शुरू कर दी, लेकिन परीक्षा परिणाम निराशाजनक रहा। हिन्‍दी विषय को छोड़ कर उसे सब विषयों में बहुत कम अंक प्राप्‍त हुए थे। कारण भी स्‍पष्‍ट था कि प्रश्‍न-पत्र अंग्रेजी माध्‍यम में होने के कारण वह प्रश्‍नों को सही ढंग से समझ नहीं पाया था।

उसका प्रथम आने का सपना चूर-चूर हो गया। छुट्टी के बाद घर लौटतेे समय वह मन ही मन डर रहा था कि वह अपने माता-पिता को क्‍या बताएगा इतनी आशाओं के साथ उन्‍होंने उसे अंग्रेजी स्‍कूल में भेजा था। घर से दस कदम दूर पड़ोस के दादा जी ने जब रमन के उतरेे हुए चेहरे को देखा वह अपने को रोक न सके। उन्‍होंने बड़े प्‍यास से रमन को बुलाया और पूछा, क्‍या बात है इतने उदास क्‍यों हो सहानुभूति पाकर रमन के आंसुओं का बॉंध टूट गया। रोते हुए उसने दादाजी को अपने अंक दिखाए।

दादाजी ने उसे प्‍यार से समझाया कि तुम्‍हारे रोने से अंक बढ़ जाऍंगे क्‍या रमन ने उन्‍हें वापस अपने पुराने सरकारी स्‍कूल में जाने की इच्‍छा प्रकट की। दादा जी बोले ‘यदि तुम्‍हारे सामने कोई समस्‍या आए तो उसका समाधान खोजना चाहिए या वहॉं से भाग जाना चाहिए’ । रमन चुप रहा , दादाजी फिर बोले ‘ रमन दिल छोटा मत करो अभ्‍यास से बड़ी से बड़ी समस्‍या हल हो सकती है। तुम कल से ही अंग्रेजी भाषा का अभ्‍यास शुरू कर दो। मैं भी तुम्‍हारी सहायता करूँगा’।

रमन ने बताया उसके पास समय का बहुत अभाव है, दादाजी ने उसे पुन: समझाया भगवान ने सभी को दिन में 24 घंटे ही दिए है। तुम काम करते-करते भी अपना पाठ याद कर सकते हो। काम तो तुम्‍हे अपने हाथों से करना है, पाठ याद करने के लिए तुम्‍हे दिमाग की जरूरत है, जो तुम्‍हारे पास है।

रमन की समझ में सब कुछ आ गया। वह नल से पानी भरते-भरते या गाय को चारा देते हुए दिमाग में उन अंग्रेजी के शब्‍दों को दोहराता रहता था, जो उसे कठिन लगते थे। उसे अपने परिश्रम का फल मिला वह अपने लक्ष्‍य को हासिल करने में सफल हो गया। जब वार्षिक परीक्षा का परिणाम आया तो रमन को कक्षा में प्रत्‍येक विषय में सर्वोच्‍च अंक प्राप्‍त हुए। उसकी कक्षा की अध्‍यापिका उसके अंक देखकर हैरान रह गयी और उन्‍होंने रमन से पूछा कि इतनी जल्‍दी उसने अंग्रेजी कैसे सुधार ली। तब रमन ने कहा ‘अभ्‍यास से’।

इस कहानी से आप संदर्भ तो अवश्‍य ही समझ गये होगें। फिर भी यहॉं व्‍याख्‍या आवश्‍यक है। यूपीएससी की परीक्षा एक सामान्‍य प्रतियोगी परीक्षा है। वह छात्र जो स्‍नातक या समकक्ष कक्षा की उपाधि धारण करता है और यूपीएससी द्वारा निर्धारित प्रयासों तथा उम्र सीमा के दायरे में आता है, वह शामिल हो सकता है। इस परीक्षा में कम अंक, ज्‍यादा अंक, सरकारी स्‍कूल, प्राइवेट स्‍कूल इत्‍यादि का फर्क नहीं पड़ता। इसमें वह छात्र भी अच्‍छा प्रदर्शन करते हैं जो अपने स्‍कूली पढ़ाई या एकेडमिक लाइफ में बहुत कम अंक प्राप्‍त करते थे। स्‍कूली जीवन में अंक न आ पाने के सैकड़ों कारण हो सकते हैं, लेकिन इसके आधार पर आप किसी की योग्‍यता या बुद्धिमतता का निर्धारण नहीं कर सकते।


यूपीएससी द्वारा श्रम एवं धैर्य के साथ-साथ सम्‍पूर्ण व्‍यक्तित्‍व का परीक्षण किया जाता। इसमें जो जितना ज्‍यादा श्रम करता है, अपने लक्ष्‍य तक उतना ही जल्‍दी पहुँचता है।

इसमें यह मानक लागू नहीं होता कि कोई आपने स्‍कूली दिनों में बहुत अच्‍छे अंक लाता था तो यहॉं भी उसे तत्‍काल अच्‍छे अंक प्राप्‍त हो जाए। उसे भी कम अंक प्राप्‍त अभ्‍यर्थी के समान कठिन परिश्रम करना पड़ता है, तभी अपने लक्ष्‍य को प्राप्‍त कर पाता है। इस क्षेत्र में ऐसे बहुत से उदाहरण है जो अपने स्‍कूली या कॉलेज के दिनों में पढ़ाई में चैम्पियन रहे हो लेकिन यूपीएससी की परीक्षा में एक बार भी प्रारम्भिक परीक्षा पास नहीं कर सके हो। 

वैसे उदाहरण भी हैं जो स्‍कूली दिनों में कम अंक वाले हो और यूपीएससी में प्रथम प्रयास में चयनित हो गये हों। इन्‍हीं जैसे लोगों ने इस कहावत को चरितार्थ किया है कि ‘ करत करत अभ्‍यास के जड़मति होत सुजान रस्‍सी आव जात ते, सिल पर पड़े निशान’। अर्थात जिस प्रकार कुऍं से पानी खींचते समय रस्‍सी जिस चट्टान से छूकर आती-जाती है, उस पर भी निशान पड़ जाते हैं। अत: जब कोमल-कोमल तंतुओं वाली रस्‍सी चट्टान में भी गहरा निशान बना सकती है,तो बारम्‍बार अभ्‍यास से क्‍या नहीं हो सकता वस्‍तुत: अभ्‍यास एक बहुत महत्‍वपूर्ण क्रिया है, जिसको अपनाना सफलता के लिए अत्‍यन्‍त आवश्‍यक है। अब हम अभ्‍यास हेतु रणनीति देखते हैं-
  1. कम से कम पिछले दस वर्ष के प्रश्‍नों को विषयावर एवं अध्‍यायवार अलग कर लेना चाहिए।
  2. प्रत्‍येक प्रश्‍न में अधिक से अधिक आयामों को समाहित करने के लिए निरन्‍तर लेखन की क्रिया करनी चाहिए।
  3. पढ़ाई में कई बार निरसता का भाव आ जाता है। इससे बचने के लिए सहपाठियों के साथ मुद्दे विशेष पर चर्चा करनी चाहिए, खुले वातावरण में टहलना चाहिए तथा सम्‍भव हो तो योग का भी सहारा लेना चा‍हिए।
  4. अपने तैयारी के स्‍तर तथा कार्यप्रणाली का मूल्‍यांकन समय-समय पर करते रहना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि आप अपने तैयारी के तरीके में यथास्थितिवादी बन जाए और आपके स्‍तर में कोई सुधार न हो रहा हो।

Source: UPSC GURU

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